1979 के पंचायत चुनाव के बाद शुरू हुआ था जनसेवा का सफर, मुखिया और चिकित्सक के रूप में दशकों तक लोगों के दिलों में बनाई जगह; अंतिम दर्शन के लिए उमड़ा जनसैलाब
कसमार (बोकारो)। समय बदलता है, पीढ़ियां बदलती हैं और व्यवस्था भी बदल जाती है, लेकिन कुछ व्यक्तित्व अपने कार्यों और व्यवहार से लोगों के दिलों में ऐसी जगह बना लेते हैं, जिसे समय भी मिटा नहीं पाता। कसमार पंचायत के पूर्व मुखिया रामकिंकर महाराज का रविवार सुबह 78 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही कसमार की पंचायत राजनीति और जनसेवा से जुड़ा एक लंबा ऐतिहासिक अध्याय समाप्त हो गया। पिछले कुछ महीनों से बीमार चल रहे रामकिंकर महाराज के निधन की खबर फैलते ही पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। अपने प्रिय जनसेवक के अंतिम दर्शन के लिए उनके पैतृक आवास पर सैकड़ों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।
रामकिंकर महाराज वर्तमान जिला परिषद सदस्य अमरदीप महाराज के पिता थे। लगभग तीन दशकों तक कसमार और गर्री को मिलाकर बनी संयुक्त कसमार पंचायत के मुखिया के रूप में उन्होंने क्षेत्र की राजनीति और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जनप्रतिनिधि होने के साथ-साथ वे एक चिकित्सक भी थे। उन्होंने लंबे समय तक ग्रामीणों की सेवा की। उनका मृदुल स्वभाव, अल्पभाषी व्यक्तित्व और लोगों की समस्याओं व भावनाओं को सहजता से समझ लेने की क्षमता उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी। वे कम बोलते थे, लेकिन लोगों की तकलीफों को समझने में देर नहीं लगाते थे।
1979 से जुड़ा है कसमार पंचायत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय
रामकिंकर महाराज के सार्वजनिक जीवन की कहानी कसमार पंचायत के इतिहास से गहराई से जुड़ी रही है। एकीकृत बिहार-झारखंड में वर्ष 1979 में हुए पंचायत चुनाव में भगवती शरण चौबे कसमार पंचायत के मुखिया निर्वाचित हुए थे। हालांकि, कुछ महीनों बाद उनके निधन के कारण मुखिया का पद रिक्त हो गया। इसके बाद उपमुखिया रहे रामकिंकर महाराज को मुखिया का पदभार मिला।
यहीं से उनके लंबे जनसेवा के सफर की शुरुआत हुई। लगभग तीन दशकों तक उन्होंने कसमार और गर्री को मिलाकर बनी संयुक्त पंचायत की जिम्मेदारी संभाली। उस दौर में पंचायत की व्यवस्था, ग्रामीणों की समस्याएं और स्थानीय विकास से जुड़े विषय उनके सार्वजनिक जीवन के प्रमुख हिस्से रहे।
उनका कार्यकाल केवल एक पद पर बने रहने की कहानी नहीं, बल्कि उस समय के ग्रामीण समाज, पंचायत व्यवस्था और स्थानीय नेतृत्व के विकास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण दौर था।
पंचायत की सीमाएं बदलीं, लेकिन जनसेवा की विरासत आगे बढ़ी
झारखंड अलग राज्य बनने के बाद वर्ष 2011 में राज्य का पहला पंचायत चुनाव संपन्न हुआ। इस चुनाव में रामकिंकर महाराज के मंझले पुत्र अमरदीप महाराज ने मुखिया पद पर जीत हासिल की। इस तरह परिवार की जनप्रतिनिधित्व से जुड़ी परंपरा को नई पीढ़ी ने आगे बढ़ाया।
बाद में कसमार पंचायत से अलग होकर गर्री को स्वतंत्र पंचायत का दर्जा मिला। समय के साथ पंचायत की सीमाएं और प्रशासनिक व्यवस्था बदलती गईं, लेकिन रामकिंकर महाराज का लंबा कार्यकाल कसमार के स्थानीय इतिहास का एक उल्लेखनीय हिस्सा बना रहा।
आज उनके पुत्र अमरदीप महाराज जिला परिषद सदस्य के रूप में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। एक ओर पिता की दशकों पुरानी सार्वजनिक जीवन की विरासत है, तो दूसरी ओर नई पीढ़ी की जिम्मेदारियां। ऐसे समय में रामकिंकर महाराज का निधन परिवार के लिए अपूरणीय व्यक्तिगत क्षति होने के साथ-साथ क्षेत्र के लिए भी एक भावनात्मक क्षण है।
मुखिया ही नहीं, चिकित्सक के रूप में भी कमाया सम्मान
रामकिंकर महाराज की पहचान केवल एक पूर्व मुखिया के रूप में सीमित नहीं थी। उन्होंने चिकित्सक के रूप में भी लंबे समय तक क्षेत्र के लोगों की सेवा की। ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों और आम लोगों की परेशानियों को करीब से समझने वाले रामकिंकर महाराज का लोगों से आत्मीय जुड़ाव था।
उनका मृदुल और अल्पभाषी स्वभाव लोगों को सहज बनाता था। वे कम शब्दों में ही सामने वाले की परेशानी और मन की बात समझने का प्रयास करते थे। सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बावजूद उनका व्यक्तित्व सहज बना रहा।
यही वजह रही कि उनके निधन की खबर सुनकर अंतिम दर्शन के लिए लोगों की भीड़ जुट गई। यह दृश्य उनके प्रति लोगों के जुड़ाव और सम्मान को बयां कर रहा था।
खांजो नदी के तट पर पंचतत्व में विलीन हुए रामकिंकर महाराज
रविवार को खांजो नदी स्थित श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके बड़े पुत्र चंद्रदीप महाराज ने मुखाग्नि दी। पैतृक आवास से लेकर श्मशान घाट तक उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा रहा। अंतिम विदाई के दौरान माहौल गमगीन रहा।
इस दुखद घड़ी में उनके पुत्र चंद्रदीप महाराज, अमरदीप महाराज, ज्ञानदीप महाराज, मयंकदीप महाराज और सूर्यदीप महाराज सहित परिवार के सदस्य मौजूद रहे।
श्रद्धांजलि देने वालों में विधायक प्रतिनिधि मो. शेरे आलम, शकुर अंसारी, यदुनंदन जायसवाल, त्रिलोचन महाराज, निर्मल चंद्र राय, शुकदेव महाराज, उमाशंकर महाराज, विष्णु चरण महाराज, ब्रजेश महाराज, विजय महाराज, नीलेश महाराज, विजय महतो, चंद्रशेखर नायक, संजीव महाराज, राहुल महाराज, रमेश महाराज, चंद्रशेखर हेंब्रम, रामप्रकाश महाराज, सुमित महाराज, राजकिशोर महाराज, संदीप सहार, रंजीत सहार, दुर्गा महाराज, धनलाल कपरदार, शशि चौबे, ऋषिकेश चौबे, संजीव चौबे, बबलू पांडेय, ब्रजेश पांडेय, त्रिभुवन पांडेय, चंद्रशेखर ठाकुर, हृदय महतो, साधु गोसाई, अशोक सिंह, सोहेल अंसारी, नसरुल होदा, रिजवान अहमद, नेपाल करमाली, प्रदीप मुखर्जी, प्रियांशु पटेल, भरत हिंदियार और जितेंद्र झा समेत दर्जनों ग्रामीण शामिल हुए।
पीढ़ियां याद रखेंगी जनसेवा का यह लंबा सफर
रामकिंकर महाराज अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका लंबा सार्वजनिक जीवन, ग्रामीणों से उनका आत्मीय रिश्ता और दशकों तक पंचायत की जिम्मेदारी संभालने का अनुभव कसमार के इतिहास की स्मृतियों में बना रहेगा।
एक मुखिया का पद समाप्त हो सकता है, पंचायत की सीमाएं बदल सकती हैं और समय के साथ नई पीढ़ी जिम्मेदारी संभाल सकती है, लेकिन जनसेवा से अर्जित सम्मान किसी पद का मोहताज नहीं होता। रामकिंकर महाराज का जीवन इसी बात की याद दिलाता है कि सादगी, संवेदनशीलता और लोगों के प्रति समर्पण ही किसी व्यक्ति को समाज की स्मृतियों में जीवित रखते हैं।
उनके निधन से कसमार ने अपना एक अनुभवी पूर्व जनप्रतिनिधि और सेवाभावी व्यक्तित्व खो दिया है। परिवार के लिए यह ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं। वहीं, क्षेत्र के उन लोगों के लिए भी यह एक भावुक विदाई है, जिन्होंने दशकों तक रामकिंकर महाराज को अपने बीच एक जनसेवक और चिकित्सक के रूप में देखा।

