…और अन्ततः नहीं रहे खोरठा रत्न ‘सुकुमार’ वेल्लोर से रांची लौटने के दौरान हुआ निधन, हमेशा के लिए थम गई मांदर-बांसी की मधुर आवाज

…और अन्ततः नहीं रहे खोरठा रत्न ‘सुकुमार’

वेल्लोर से रांची लौटने के दौरान हुआ निधन, हमेशा के लिए थम गई मांदर-बांसी की मधुर आवाज

Bokaro : झारखंड की लोकसंस्कृति, खोरठा भाषा और जनभावनाओं की आत्मा माने जाने वाले खोरठा रत्न सुकुमार अब हमारे बीच नहीं रहे।

आर्थिक अभाव और गंभीर बीमारी से जूझ रहे सुकुमार जी का निधन वेल्लोर से रांची लौटने के दौरान हो गया।

यह खबर सिर्फ एक व्यक्ति के निधन की नहीं, बल्कि झारखंड की लोकधुन, गांवों की आत्मा और खोरठा संस्कृति की एक अमूल्य आवाज के हमेशा के लिए खामोश हो जाने की खबर है।

“मांइदर बाजे रे… बांसी बाजे रे…” जैसे अमर लोकगीतों के रचयिता सुकुमार जी ने पूरी जिंदगी झारखंडी भाषा, संस्कृति और लोकसंगीत को समर्पित कर दी।

उनकी आवाज ने गांव-गांव के पर्व-त्योहारों में जान फूंकी, मांदर और बांसुरी की धुन को नई पीढ़ी तक पहुंचाया।

सुकुमार जी केवल लोकगायक नहीं थे।

वे खोरठा साहित्य के मजबूत स्तंभ, प्रख्यात कवि, साहित्यकार, चित्रकार, दूरदर्शन कलाकार और खोरठा आंदोलन के सच्चे सिपाही थे।

उन्हें खोरठा भाषा का “जयशंकर प्रसाद” कहा जाता था।

बीमारी के बाद बेहतर इलाज की उम्मीद में उन्हें CMC वेल्लोर ले जाया गया था, लेकिन भारी चिकित्सा खर्च और आर्थिक तंगी के कारण इलाज जारी रखना संभव नहीं हो पाया।

इसके बाद उन्हें वापस रांची लाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही जिंदगी की जंग हार गए।

सबसे पीड़ादायक बात यह रही कि जिसने पूरी जिंदगी अपनी कला से झारखंड को खुशियां दीं, वही कलाकार अंतिम समय में आर्थिक अभाव से जूझता रहा।

यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा सवाल छोड़ गया है।

आज खोरठा समाज, साहित्य जगत, लोक कलाकार और झारखंड का हर संवेदनशील व्यक्ति शोक में डूबा है।

सोशल मीडिया पर हजारों लोग उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कह रहे हैं —

“एक कलाकार नहीं, झारखंड की आत्मा चली गई।”

सुकुमार जी का जाना खोरठा संस्कृति के लिए अपूरणीय क्षति है।

लेकिन उनके गीत, उनकी लेखनी और उनकी आवाज हमेशा झारखंड की मिट्टी में जिंदा रहेगी।झारखंड की धरती अपने इस महान सपूत को नम आंखों से अंतिम जोहार करती है।

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